बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के हिसार जिले के ‘बीड़ गांव’ में स्थापित है, जहाँ आज भी श्रद्धा से उनकी धड़ की पूजा-अर्चना की जाती है।
बर्बरीक महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा घटोत्कच और मोरवी के पुत्र तथा भीमसेन के पौत्र थे। वे महान धनुर्धर और ‘तीन बाणधारी’ के नाम से प्रसिद्ध थे, क्योंकि उनके पास तीन चमत्कारिक बाण और एक दिव्य धनुष महादेव और अग्निदेव से प्राप्त थे।
बर्बरीक का जन्म राक्षसी कुल में हुआ था, लेकिन उन्होंने बचपन से ही देवी तपस्या, युद्ध कौशल और धर्म के मार्ग का अनुसरण किया। उनकी माता अहिलावती (या मोरवी) ने उन्हें हमेशा सही और धर्म की राह पर चलने की शिक्षा दी।
बर्बरीक ने देवी की कठिन तपस्या से तीन ऐसे अद्भुत बाण पाए, जिनसे वे केवल एक बाण के माध्यम से समस्त शत्रु सेना को नष्ट कर सकते थे। इसी कारण उन्हें ‘तीन बाणधारी’ कहा जाता है।
महाभारत युद्ध की सूचना जब बर्बरीक को मिली, तब उन्होंने माँ से अनुमति लेकर युद्ध में भाग लेने का निश्चय किया। माँ के आदेश पर उन्होंने वचन दिया कि वे हमेशा हारने वाले पक्ष का साथ देंगे।
युद्ध के पहले श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में बर्बरीक की परीक्षा ली। श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि बर्बरीक यदि युद्ध में उतर गए, तो केवल हारने वाले का साथ देंगे, जिससे महाभारत का संतुलन बिगड़ जाएगा। श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उनका शीश मांग लिया, जिसे बर्बरीक ने हँसते-हँसते दान कर दिया।
बर्बरीक ने श्रीकृष्ण को अपना शीश अर्पित किया। कृष्ण प्रसन्न हुए और कहा कि कलियुग में वे ही ‘श्याम’ नाम से पूजे जायेंगे। तब से बर्बरीक ‘खाटू श्याम’ नाम से प्रसिद्ध हैं।
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बर्बरीक का शीश राजस्थान के सीकर ज़िले के ‘खाटू’ गाँव में स्थापित हुआ, जहाँ भव्य ‘खाटू श्याम मंदिर’ निर्मित है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालु उनकी पूजा करने पहुँचते हैं।
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बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के हिसार जिले के ‘बीड़ गांव’ में स्थापित है, जहाँ ‘श्याम बाबा मंदिर’ के रूप में उनकी धड़-पूजा प्रतिदिन होती है।
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क्षेत्रीय मान्यता के अनुसार, जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का शीश काटा, तो उनका धड़ इसी स्थान पर बरगद के पेड़ के नीचे गिरा था।
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बर्बरीक का सिर और धड़ अलग-अलग नदियों में विसर्जित किए गए थे; वर्षों बाद दोनों धार्मिक स्थानों पर पूजनीय हुए।
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किंवदंतियों में आता है कि अकबर के काल के बाद बीड़ गांव में गांववासियों को बरगद के पेड़ के नीचे बर्बरीक का धड़ मिला।
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1707 ईसवीं में यहां बर्बरीक के धड़ की मूर्ति मिली और छोटा कच्चा मंदिर बनाया गया, जिसे श्याम बाबा मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।
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दूर-दूर से भक्त यहां धड़ के दर्शनों हेतु पहुंचते हैं।
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मान्यता है कि जो भी व्यक्ति हार कर यहाँ आता है, उसकी मनोकामना श्याम बाबा पूरी करते हैं। भक्तों का विश्वास है कि बाबा का धड़ स्थान अत्यंत चमत्कारी है।
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फाल्गुन मास में तथा श्रद्धा के पर्वों पर विशाल मेले लगते हैं, और श्रद्धालु धरती पर उपस्थित बाबा श्याम के धड़ के दर्शन पाकर कृतार्थ होते हैं।
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बर्बरीक के शीश की स्थापना खाटू गाँव (सीकर, राजस्थान) के प्रसिद्ध मंदिर में हुई, जिसे ‘खाटू श्याम जी का मंदिर’ कहा जाता है।
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वहां की कथा अनुसार, कई वर्षों बाद एक गाय स्वयं वहाँ रोज़ दूध बहाती थी, जिससे मंदिर स्थल का पता पड़ा। खोज के दौरान शीश प्राप्त हुआ, जिसे राजाज्ञा पर मंदिर में स्थापित किया गया।
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कुरुक्षेत्र युद्ध के पूरे दृश्य का साक्षात्कार करने का वरदान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के शीश को दिया था, जिससे बर्बरीक ने युद्ध का पूरा दृश्य देखा।
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अंतिम दिन महाभारत की विजय का असली हकदार कौन, यह प्रश्न सभी योद्धाओं से पूछा गया, तब बर्बरीक के निष्पक्ष उत्तर ने अहंकार दूर किया।
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श्रीकृष्ण के दिए वरदान के अनुसार, कलियुग में बर्बरीक को ‘श्याम’ नाम और विशेष पूजा प्राप्त हुई, इसीलिए आज श्याम बाबा के दो मुख्य पावन स्थल हैं – खाटू (शीश) और बीड़, हिसार (धड़)।
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कहा जाता है कि औरंगजेब के काल में खाटू धाम मंदिर को तोड़ दिया गया था, पुनः 1720 ईसवीं में इसका पुनर्निर्माण हुआ। बीड़ गांव का मंदिर 1707 में स्थापित हुआ।
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श्याम बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैली, हरियाणा, राजस्थान और भारत के अन्य राज्यों में भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
बर्बरीक का धड़ भूमि आज भी हरियाणा के हिसार जिले के बीड़ गांव में ‘श्याम बाबा मंदिर’ में श्रद्धा से पूजित है; वहीं शीश राजस्थान के खाटू धाम में पूजित है। दोनों स्थान भारतीय संस्कृति, धर्म और आस्था में अद्भुत स्थान रखते हैं।
लोग यह भी पूछते हैं
बर्बरीक का शीशदान और वरदान बर्बरीक क्या है?
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बर्बरीक का शीशदान और वरदान बर्बरीक ने श्रीकृष्ण को अपना शीश अर्पित किया। मंदिर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व मान्यता है कि जो भी व्यक्ति हार कर यहाँ आता है, उसकी मनोकामना श्याम बाबा पूरी करते हैं। 1707 ईसवीं में यहां बर्बरीक के धड़ की मूर्ति मिली और छोटा कच्चा मंदिर बनाया गया, जिसे श्याम बाबा मंदिर के नाम से जाना जाने लगा
मंदिर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व क्यों महत्वपूर्ण है?
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मंदिर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व मान्यता है कि जो भी व्यक्ति हार कर यहाँ आता है, उसकी मनोकामना श्याम बाबा पूरी करते हैं। 1707 ईसवीं में यहां बर्बरीक के धड़ की मूर्ति मिली और छोटा कच्चा मंदिर बनाया गया, जिसे श्याम बाबा मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उनका शीश मांग लिया, जिसे बर्बरीक ने हँसते-हँसते दान कर दिया
1707 ईसवीं में यहां बर्बरीक के कैसे काम करता है?
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1707 ईसवीं में यहां बर्बरीक के धड़ की मूर्ति मिली और छोटा कच्चा मंदिर बनाया गया, जिसे श्याम बाबा मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उनका शीश मांग लिया, जिसे बर्बरीक ने हँसते-हँसते दान कर दिया। बीड़ गांव में बर्बरीक धड़ की स्थापना किंवदंतियों में आता है कि अकबर के काल के बाद बीड़ गांव में गांववासियों को बरगद के पेड़ के नीचे बर्बरीक का धड़ मिला
श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उनका शीश कब और क्यों उपयोग किया जाता है?
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श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उनका शीश मांग लिया, जिसे बर्बरीक ने हँसते-हँसते दान कर दिया। बीड़ गांव में बर्बरीक धड़ की स्थापना किंवदंतियों में आता है कि अकबर के काल के बाद बीड़ गांव में गांववासियों को बरगद के पेड़ के नीचे बर्बरीक का धड़ मिला। कृष्ण प्रसन्न हुए और कहा कि कलियुग में वे ही ‘श्याम’ नाम से पूजे जायेंगे
बीड़ गांव में बर्बरीक धड़ की का असली अर्थ क्या है?
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बीड़ गांव में बर्बरीक धड़ की स्थापना किंवदंतियों में आता है कि अकबर के काल के बाद बीड़ गांव में गांववासियों को बरगद के पेड़ के नीचे बर्बरीक का धड़ मिला। कृष्ण प्रसन्न हुए और कहा कि कलियुग में वे ही ‘श्याम’ नाम से पूजे जायेंगे। बर्बरीक से खाटू श्याम बनने की यात्रा श्रीकृष्ण के दिए वरदान के अनुसार, कलियुग में बर्बरीक को ‘श्याम’ नाम और विशेष पूजा प्राप्त हुई, इसीलिए आज श्याम बाबा के दो मुख्य पावन स्थल हैं – खाटू (शीश) और बीड़, हिसार (धड़)
कृष्ण प्रसन्न हुए और कहा कि से क्या लाभ होते हैं?
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कृष्ण प्रसन्न हुए और कहा कि कलियुग में वे ही ‘श्याम’ नाम से पूजे जायेंगे। बर्बरीक से खाटू श्याम बनने की यात्रा श्रीकृष्ण के दिए वरदान के अनुसार, कलियुग में बर्बरीक को ‘श्याम’ नाम और विशेष पूजा प्राप्त हुई, इसीलिए आज श्याम बाबा के दो मुख्य पावन स्थल हैं – खाटू (शीश) और बीड़, हिसार (धड़)। भगवान श्रीकृष्ण से भेंट युद्ध के पहले श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में बर्बरीक की परीक्षा ली
बर्बरीक से खाटू श्याम बनने की का इतिहास क्या है?
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बर्बरीक से खाटू श्याम बनने की यात्रा श्रीकृष्ण के दिए वरदान के अनुसार, कलियुग में बर्बरीक को ‘श्याम’ नाम और विशेष पूजा प्राप्त हुई, इसीलिए आज श्याम बाबा के दो मुख्य पावन स्थल हैं – खाटू (शीश) और बीड़, हिसार (धड़)। भगवान श्रीकृष्ण से भेंट युद्ध के पहले श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में बर्बरीक की परीक्षा ली। तीन बाणों का वरदान बर्बरीक ने देवी की कठिन तपस्या से तीन ऐसे अद्भुत बाण पाए, जिनसे वे केवल एक बाण के माध्यम से समस्त शत्रु सेना को नष्ट कर सकते थे
भगवान श्रीकृष्ण से भेंट युद्ध के से जुड़ी खास बात क्या है?
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भगवान श्रीकृष्ण से भेंट युद्ध के पहले श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण वेश में बर्बरीक की परीक्षा ली। तीन बाणों का वरदान बर्बरीक ने देवी की कठिन तपस्या से तीन ऐसे अद्भुत बाण पाए, जिनसे वे केवल एक बाण के माध्यम से समस्त शत्रु सेना को नष्ट कर सकते थे। बर्बरीक महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा घटोत्कच और मोरवी के पुत्र तथा भीमसेन के पौत्र थे
तीन बाणों का वरदान बर्बरीक ने को लोग इतना क्यों मानते हैं?
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तीन बाणों का वरदान बर्बरीक ने देवी की कठिन तपस्या से तीन ऐसे अद्भुत बाण पाए, जिनसे वे केवल एक बाण के माध्यम से समस्त शत्रु सेना को नष्ट कर सकते थे। बर्बरीक महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा घटोत्कच और मोरवी के पुत्र तथा भीमसेन के पौत्र थे। बर्बरीक का सिर और धड़ अलग-अलग नदियों में विसर्जित किए गए थे; वर्षों बाद दोनों धार्मिक स्थानों पर पूजनीय हुए
बर्बरीक महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा घटोत्कच के पीछे क्या मान्यता है?
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बर्बरीक महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा घटोत्कच और मोरवी के पुत्र तथा भीमसेन के पौत्र थे। बर्बरीक का सिर और धड़ अलग-अलग नदियों में विसर्जित किए गए थे; वर्षों बाद दोनों धार्मिक स्थानों पर पूजनीय हुए। बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के हिसार जिले के ‘बीड़ गांव’ में स्थापित है, जहाँ ‘श्याम बाबा मंदिर’ के रूप में उनकी धड़-पूजा प्रतिदिन होती है
बर्बरीक का सिर और धड़ अलग-अलग का सही तरीका क्या है?
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बर्बरीक का सिर और धड़ अलग-अलग नदियों में विसर्जित किए गए थे; वर्षों बाद दोनों धार्मिक स्थानों पर पूजनीय हुए। बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के हिसार जिले के ‘बीड़ गांव’ में स्थापित है, जहाँ ‘श्याम बाबा मंदिर’ के रूप में उनकी धड़-पूजा प्रतिदिन होती है। श्याम बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैली, हरियाणा, राजस्थान और भारत के अन्य राज्यों में भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं
बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के के बारे में पूरी जानकारी क्या है?
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बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के हिसार जिले के ‘बीड़ गांव’ में स्थापित है, जहाँ ‘श्याम बाबा मंदिर’ के रूप में उनकी धड़-पूजा प्रतिदिन होती है। श्याम बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैली, हरियाणा, राजस्थान और भारत के अन्य राज्यों में भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। अंतिम दिन महाभारत की विजय का असली हकदार कौन, यह प्रश्न सभी योद्धाओं से पूछा गया, तब बर्बरीक के निष्पक्ष उत्तर ने अहंकार दूर किया
श्याम बाबा की ख्याति दूर-दूर तक कैसे समझा जा सकता है?
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श्याम बाबा की ख्याति दूर-दूर तक फैली, हरियाणा, राजस्थान और भारत के अन्य राज्यों में भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। अंतिम दिन महाभारत की विजय का असली हकदार कौन, यह प्रश्न सभी योद्धाओं से पूछा गया, तब बर्बरीक के निष्पक्ष उत्तर ने अहंकार दूर किया। बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के हिसार जिले के ‘बीड़ गांव’ में स्थापित है, जहाँ आज भी श्रद्धा से उनकी धड़ की पूजा-अर्चना की जाती है
अंतिम दिन महाभारत की विजय का से क्या सीख मिलती है?
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अंतिम दिन महाभारत की विजय का असली हकदार कौन, यह प्रश्न सभी योद्धाओं से पूछा गया, तब बर्बरीक के निष्पक्ष उत्तर ने अहंकार दूर किया। बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के हिसार जिले के ‘बीड़ गांव’ में स्थापित है, जहाँ आज भी श्रद्धा से उनकी धड़ की पूजा-अर्चना की जाती है। बर्बरीक का जीवन परिचय बर्बरीक का जन्म राक्षसी कुल में हुआ था, लेकिन उन्होंने बचपन से ही देवी तपस्या, युद्ध कौशल और धर्म के मार्ग का अनुसरण किया
बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के का महत्व क्यों बढ़ रहा है?
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बर्बरीक का धड़ हरियाणा राज्य के हिसार जिले के ‘बीड़ गांव’ में स्थापित है, जहाँ आज भी श्रद्धा से उनकी धड़ की पूजा-अर्चना की जाती है। बर्बरीक का जीवन परिचय बर्बरीक का जन्म राक्षसी कुल में हुआ था, लेकिन उन्होंने बचपन से ही देवी तपस्या, युद्ध कौशल और धर्म के मार्ग का अनुसरण किया। श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि बर्बरीक यदि युद्ध में उतर गए, तो केवल हारने वाले का साथ देंगे, जिससे महाभारत का संतुलन बिगड़ जाएगा
बर्बरीक का जीवन परिचय बर्बरीक का का वास्तविक रहस्य क्या है?
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बर्बरीक का जीवन परिचय बर्बरीक का जन्म राक्षसी कुल में हुआ था, लेकिन उन्होंने बचपन से ही देवी तपस्या, युद्ध कौशल और धर्म के मार्ग का अनुसरण किया। श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि बर्बरीक यदि युद्ध में उतर गए, तो केवल हारने वाले का साथ देंगे, जिससे महाभारत का संतुलन बिगड़ जाएगा। वहां की कथा अनुसार, कई वर्षों बाद एक गाय स्वयं वहाँ रोज़ दूध बहाती थी, जिससे मंदिर स्थल का पता पड़ा
श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि बर्बरीक किससे संबंधित है?
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श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि बर्बरीक यदि युद्ध में उतर गए, तो केवल हारने वाले का साथ देंगे, जिससे महाभारत का संतुलन बिगड़ जाएगा। वहां की कथा अनुसार, कई वर्षों बाद एक गाय स्वयं वहाँ रोज़ दूध बहाती थी, जिससे मंदिर स्थल का पता पड़ा। फाल्गुन मास में तथा श्रद्धा के पर्वों पर विशाल मेले लगते हैं, और श्रद्धालु धरती पर उपस्थित बाबा श्याम के धड़ के दर्शन पाकर कृतार्थ होते हैं
वहां की कथा अनुसार, कई वर्षों का सरल अर्थ क्या है?
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वहां की कथा अनुसार, कई वर्षों बाद एक गाय स्वयं वहाँ रोज़ दूध बहाती थी, जिससे मंदिर स्थल का पता पड़ा। फाल्गुन मास में तथा श्रद्धा के पर्वों पर विशाल मेले लगते हैं, और श्रद्धालु धरती पर उपस्थित बाबा श्याम के धड़ के दर्शन पाकर कृतार्थ होते हैं। युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान महाभारत युद्ध की सूचना जब बर्बरीक को मिली, तब उन्होंने माँ से अनुमति लेकर युद्ध में भाग लेने का निश्चय किया
फाल्गुन मास में तथा श्रद्धा के से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
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फाल्गुन मास में तथा श्रद्धा के पर्वों पर विशाल मेले लगते हैं, और श्रद्धालु धरती पर उपस्थित बाबा श्याम के धड़ के दर्शन पाकर कृतार्थ होते हैं। युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान महाभारत युद्ध की सूचना जब बर्बरीक को मिली, तब उन्होंने माँ से अनुमति लेकर युद्ध में भाग लेने का निश्चय किया। बर्बरीक का शीश राजस्थान के सीकर ज़िले के ‘खाटू’ गाँव में स्थापित हुआ, जहाँ भव्य ‘खाटू श्याम मंदिर’ निर्मित है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालु उनकी पूजा करने पहुँचते हैं
युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान महाभारत के बारे में लोग क्या जानना चाहते हैं?
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युद्ध भूमि की ओर प्रस्थान महाभारत युद्ध की सूचना जब बर्बरीक को मिली, तब उन्होंने माँ से अनुमति लेकर युद्ध में भाग लेने का निश्चय किया। बर्बरीक का शीश राजस्थान के सीकर ज़िले के ‘खाटू’ गाँव में स्थापित हुआ, जहाँ भव्य ‘खाटू श्याम मंदिर’ निर्मित है और हर वर्ष लाखों श्रद्धालु उनकी पूजा करने पहुँचते हैं। उनकी माता अहिलावती (या मोरवी) ने उन्हें हमेशा सही और धर्म की राह पर चलने की शिक्षा दी